मंदिरों के फंड (Temple Funds) के उपयोग को लेकर देश भर में चल रही बहस के बीच, मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का फैसला सुनाया है। अदालत ने उस सरकारी आदेश (Government Order – GO) को रद्द कर दिया है, जिसके तहत राज्य ने पांच अलग-अलग मंदिरों के धन का उपयोग करके मैरिज हॉल (marriage halls) के निर्माण की अनुमति दी थी।
जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम (SM Subramaniam) और जस्टिस जी अरुल मुरुगन (G Arul Murugan) की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य का यह निर्णय हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (Hindu Religious and Charitable Endowment Act, 1959) और उसके नियमों के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, और यह “धार्मिक उद्देश्य” (“religious purpose”) की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आता है।
क्यों रद्द किया गया सरकारी आदेश? जानें हाईकोर्ट की 3 बड़ी दलीलें
याचिकाकर्ता ने सरकारी आदेशों को चुनौती देते हुए कहा था कि मंदिर के फंड का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों (commercial purposes) के लिए नहीं किया जा सकता है। अदालत ने इस मामले पर गहराई से विचार किया और कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
1. हिंदू विवाह एक ‘धार्मिक उद्देश्य’ नहीं:
अदालत ने कहा कि हालांकि हिंदू विवाहों को मुख्य रूप से एक संस्कार (sacrament) माना जाता है, लेकिन इसमें अनुबंध (contract) के तत्व भी शामिल होते हैं।
- कोर्ट ने कहा, “हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत मान्यता प्राप्त हिंदू विवाह के सिद्धांतों में एक पवित्र मिलन के तत्व शामिल हैं, जो संविदात्मक शर्तों (contractual terms) से बंधा होता है। इसलिए, विवाह जो दो व्यक्तियों का एक पवित्र मिलन है, अपने आप में एक ‘धार्मिक उद्देश्य’ का गठन नहीं कर सकता। इसलिए, विवाह को सीधे तौर पर धार्मिक उद्देश्यों से नहीं जोड़ा जा सकता।“
2. मंदिर का पैसा ‘सरप्लस फंड’ नहीं, जिसका कहीं भी इस्तेमाल हो:
अदालत ने एचआर एंड सीई अधिनियम की धारा 66 का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिशेष धन (surplus funds) को वाणिज्यिक या लाभ कमाने वाले उपक्रमों के लिए नहीं लगाया जा सकता, बल्कि इसे धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य (religious or charitable purpose) तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।
3. मैरिज हॉल मुफ्त नहीं, यह एक बिजनेस है:
सरकारी आदेश की जांच करने पर, अदालत ने पाया कि इन मैरिज हॉल को मुफ्त में नहीं दिया जाना था, बल्कि शुल्क के भुगतान पर किराए पर दिया जाना था।
- अदालत ने कहा कि सरकारी आदेश के उद्देश्य में कोई धर्मार्थ (charity) नहीं था, और इसलिए, इसे अधिनियम के तहत एक ‘धार्मिक उद्देश्य’ नहीं कहा जा सकता।
“मंदिर का पैसा पब्लिक फंड या सरकारी फंड नहीं है”
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए, कोर्ट ने मंदिर के फंड की पवित्रता पर जोर दिया।
- कोर्ट ने कहा, “मंदिर का फंड भक्तों और दानदाताओं द्वारा दिए गए दान से और देवता/मंदिर के पक्ष में उपहार में दी गई अचल संपत्तियों से केवल धार्मिक उद्देश्यों के लिए एकत्र किया जाता है। इस प्रकार, मंदिर के फंड को सार्वजनिक धन या सरकारी धन नहीं माना जा सकता है।“
- कोर्ट ने आगे कहा कि यदि प्रावधान के दायरे का विस्तार किया गया और मंदिर के फंड का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया गया, तो इससे मंदिर के फंड का दुरुपयोग, और गलत उपयोग होगा और यह हिंदू भक्तों के अधिकारों का उल्लंघन करेगा।
सरकार का काम सिर्फ फंड का दुरुपयोग रोकना
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य भर के मंदिरों के मामलों को नियंत्रित करते समय, सरकार की भूमिका केवल मंदिर के फंड और उसकी संपत्तियों के दुरुपयोग या हेराफेरी को रोकना है, न कि उसे अपनी मर्जी से खर्च करना।
यह देखते हुए कि राज्य ने अधिशेष धन के उपयोग के नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था या बिल्डिंग परमिट भी प्राप्त नहीं किया था, अदालत ने उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया। यह फैसला भविष्य में मंदिर के फंड के उपयोग को लेकर एक स्पष्ट दिशानिर्देश स्थापित करता है।







