सूर्य उपासना, लोक आस्था और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का चार दिवसीय महापर्व छठ (Chhath Puja 2025), नहाय-खाय की पवित्र विधि के साथ आरंभ हो चुका है। शनिवार को नहाय-खाय के बाद, रविवार को व्रती ‘खरना’ का पूजन कर 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास शुरू करेंगे। इस महापर्व का सबसे महत्वपूर्ण और दिव्य क्षण होता है अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य और उदीयमान (उगते हुए) सूर्य को अर्घ्य देना।
इस वर्ष, ज्योतिषीय दृष्टि से अर्घ्य का समय और भी खास बन गया है क्योंकि यह कई शुभ योगों के संयोग में पड़ रहा है। आइए, जानते हैं कि छठ पूजा के संध्याकालीन और सुबह के अर्घ्य का सही समय क्या है और भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की यह अनूठी परंपरा क्यों इतनी महत्वपूर्ण है।
अर्घ्य का शुभ मुहूर्त और समय (Chhath Puja Arghya Timings 2025)
1. संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को अर्घ्य) – सोमवार, 27 अक्टूबर 2025:
इस दिन व्रती दिन भर निर्जला उपवास रखने के बाद, शाम को नदी, तालाब या किसी भी पवित्र जलाशय में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को पहला अर्घ्य देंगे।
- शुभ योग: इस दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के साथ सुकर्मा योग का निर्माण हो रहा है, जो इस अर्घ्य को और भी फलदायी बनाएगा।
- पटना में सूर्यास्त का समय: शाम 05:11 PM
2. उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को अर्घ्य) – मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025:
रात भर घाट पर जागरण करने के बाद, व्रती सुबह उगते हुए सूर्य को दूसरा और अंतिम अर्घ्य देंगे।
- शुभ योग: इस दिन त्रिपुष्कर योग और रवि योग का मंगलकारी संयोग बन रहा है, जो सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला माना जाता है।
- पटना में सूर्योदय का समय: सुबह 05:55 AM
उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद, व्रती पारण करके अपने 36 घंटे के कठिन व्रत का समापन करेंगे।
बिहार के प्रमुख शहरों में अर्घ्य का समय (27 अक्टूबर सूर्यास्त और 28 अक्टूबर सूर्योदय):
| शहर | सूर्यास्त (27 अक्टूबर) | सूर्योदय (28 अक्टूबर) |
| पटना | शाम 05:11 PM | सुबह 05:55 AM |
| गया | शाम 05:11 PM | सुबह 05:55 AM |
| भागलपुर | शाम 05:04 PM | सुबह 05:47 AM |
| मुजफ्फरपुर | शाम 05:10 PM | सुबह 05:54 AM |
| दरभंगा | शाम 05:08 PM | सुबह 05:52 AM |
| पूर्णिया | शाम 05:02 PM | सुबह 05:46 AM |
(कृपया ध्यान दें कि आपके स्थानीय क्षेत्र के अनुसार समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।)
क्यों दिया जाता है डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य? जानें पौराणिक महत्व
छठ पूजा एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते और उगते, दोनों ही स्वरूपों में सूर्य की उपासना की जाती है। इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व छिपा है।
- डूबते सूर्य को अर्घ्य (संध्या अर्घ्य): डूबता हुआ सूर्य अस्त नहीं, बल्कि विश्राम की अवस्था में होता है। यह दिन भर की ऊर्जा को समेटकर अपनी दूसरी यात्रा की तैयारी करता है। संध्या अर्घ्य देकर व्रती सूर्य देव की पूरे दिन की कृपा के लिए उनका धन्यवाद करते हैं और यह संदेश देते हैं कि जिस तरह सूर्य अस्त होने के बाद फिर से उदय होता है, उसी तरह जीवन में भी उतार-चढ़ाव आते-जाते रहते हैं। यह चक्र का प्रतीक है।
- उगते सूर्य को अर्घ्य (उषा अर्घ्य): उगता हुआ सूर्य एक नई शुरुआत, नई ऊर्जा, और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती अपने जीवन में एक नई सुबह, स्वास्थ्य, सुख, और समृद्धि की कामना करते हैं।
स्कंदपुराण में भी उल्लेख है कि जो व्यक्ति इस प्रकार से सूर्य की उपासना करता है, वह जीवन में हर प्रकार के सुखों का भोग करता है, हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है, और उसे पुत्र-पौत्रों से युक्त चक्रवर्ती राजा के समान सुख मिलता है।
सूर्य अर्घ्य मंत्र:
एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर:॥
छठ पूजा का यह चार दिवसीय अनुष्ठान, जो ऋग्वैदिक काल से चला आ रहा है, प्रकृति और मानव के अटूट संबंध का सबसे बड़ा उत्सव है।







