छठ पूजा 2025: कैसे हुई लोक आस्था के इस महापर्व की शुरुआत? जानें द्रौपदी और माता सीता से जुड़ा पौराणिक इतिहास
लोक आस्था, पवित्रता और सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ (Chhath Puja), नहाय-खाय के साथ प्रारंभ हो चुका है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह त्योहार अब देश-विदेश में बसे प्रवासियों के कारण एक वैश्विक पर्व बन चुका है। यह एकमात्र ऐसा हिंदू त्योहार है जिसमें व्रती (व्रत करने वाले) अस्ताचलगामी (डूबते हुए) और उदीयमान (उगते हुए), दोनों स्वरूपों में सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं।
यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य देव (Surya Dev) और उनकी बहन छठी मैया (Chhathi Maiya) को समर्पित है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस कठिन व्रत और अनूठी परंपरा की शुरुआत कैसे हुई थी? छठ पूजा का इतिहास रामायण और महाभारत, दोनों कालों से जुड़ा है, जिसकी कथाएं अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक हैं।
छठ महापर्व की शुरुआत से जुड़ी पौराणिक कथाएं
आचार्य राजकुमार शास्त्री के अनुसार, छठ पूजा की परंपरा की शुरुआत को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं:
1. महाभारत काल में द्रौपदी ने की थी छठ पूजा
एक प्रमुख मान्यता के अनुसार, छठ पूजा की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने अपने परिवार की सुख-समृद्धि और खोया हुआ राजपाट वापस पाने के लिए छठ का यह कठोर व्रत किया था। उन्होंने सूर्य देव की उपासना की, जिससे प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें मनोवांछित फल प्रदान किया और पांडवों को उनका सब कुछ वापस मिल गया। माना जाता है कि तभी से छठ पूजा की परंपरा आरंभ हुई।
2. सूर्यपुत्र कर्ण ने भी की थी सूर्य की उपासना
एक और कथा सूर्यपुत्र कर्ण से जुड़ी है। कहा जाता है कि कर्ण, भगवान सूर्य के अनन्य भक्त थे और वह प्रतिदिन घंटों तक कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। उन्हीं की कृपा से वह एक महान योद्धा बने। कुछ लोगों का मानना है कि छठ पूजा की परंपरा कर्ण द्वारा ही शुरू की गई थी।
3. त्रेतायुग में माता सीता ने की थी पहली सूर्योपासना
एक अन्य और सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत त्रेतायुग में हुई थी।
- रावण वध के पाप से मुक्ति: जब भगवान राम और माता सीता 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद अयोध्या लौटे, तो रावण वध के पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने राजसूय यज्ञ करने का फैसला किया।
- मुग्दल ऋषि का आदेश: पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने गंगाजल छिड़क कर माता सीता को पवित्र किया और उन्हें कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की उपासना करने का आदेश दिया।
- छह दिनों की कठोर पूजा: माता सीता ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर पूरे छह दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए सूर्य भगवान की कठोर तपस्या और पूजा की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय, उन्होंने फिर से अनुष्ठान कर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया और सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
माना जाता है कि तभी से यह परंपरा छठ महापर्व के रूप में मनाई जाने लगी।
क्या है छठ पूजा का महत्व?
छठ पूजा केवल एक व्रत नहीं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है।
- सूर्य की उपासना: सूर्य को ऊर्जा और जीवन का स्रोत माना जाता है। छठ पूजा के माध्यम से भक्त सूर्य देव को उनकी कृपा के लिए धन्यवाद देते हैं।
- छठी मैया: छठी मैया को भगवान सूर्य की बहन माना जाता है। वह संतान की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं। इसलिए, निःसंतान दंपत्ति भी संतान प्राप्ति की कामना के साथ यह व्रत रखते हैं।
- सामाजिक समरसता: यह पर्व जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेद को मिटाकर सामाजिक समरसता का एक बड़ा उदाहरण पेश करता है, जहां सभी लोग एक साथ नदी या तालाब के घाट पर इकट्ठा होकर अर्घ्य देते हैं।
छठ पूजा का चार दिवसीय अनुष्ठान (नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य) व्रती के कठिन तप, त्याग और अटूट आस्था का प्रतीक है, जो इसे सभी त्योहारों में सबसे विशिष्ट और पवित्र बनाता है।







