एक तरफ सुप्रीम कोर्ट से राहुल गांधी के ‘सच्चे भारतीय’ होने को लेकर मिली टिप्पणी परेशान करने वाली हो सकती है, लेकिन दूसरी तरफ ‘एसआईआर’ (SIR) के विवादास्पद मुद्दे पर बिखरे हुए इंडिया ब्लॉक (INDIA bloc) का एकजुट होना कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए एक बड़ी राजनीतिक राहत है। यह एकजुटता ऐसे समय में आई है जब महाराष्ट्र चुनाव में मिली हार के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठने लगे थे, और ममता बनर्जी से लेकर लालू यादव और शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता भी विरोधी तेवर अपनाए हुए थे।
अक्सर देखा गया है कि राहुल गांधी बीजेपी के खिलाफ कोई न कोई ऐसा मुद्दा उठा देते हैं, जो तमाम मतभेदों के बावजूद विपक्ष को एक साथ खड़ा होने पर मजबूर कर देता है। वोटर लिस्ट से नाम हटाने के आरोपों से जुड़े SIR के मुद्दे पर भी विपक्ष ठीक उसी तरह एकजुट नजर आ रहा है, जैसे बीते दिनों जाति जनगणना या अंबेडकर के अपमान के मुद्दे पर दिखा था। हालांकि, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग पर इस एकता में दरारें भी साफ दिखी थीं।
खासकर, आम आदमी पार्टी (AAP) ने तो दिल्ली चुनाव के बाद से ही इंडिया ब्लॉक से पूरी तरह किनारा कर लिया था और स्पेशल सेशन की मांग वाले संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। AAP ने साफ कहा था कि इंडिया ब्लॉक से अब उसका कोई वास्ता नहीं है। लेकिन SIR का मुद्दा ऐसा है, जिसने बिहार से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में हलचल मचा दी है और आम आदमी पार्टी को भी इंडिया ब्लॉक के थोड़ा करीब आने पर मजबूर कर दिया है। यह राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।
राहुल का डिनर और विपक्ष का मार्च: एकता की बड़ी परीक्षा
विपक्षी एकता को धार देने के लिए, 7 अगस्त को एक डिनर और 8 अगस्त को चुनाव आयोग के दफ्तर तक विरोध मार्च की योजना बनाई गई है। खास बात यह है कि इस बार विपक्षी दलों के डिनर के होस्ट कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे नहीं, बल्कि खुद राहुल गांधी (Rahul Gandhi) हैं। यह डिनर डिप्लोमेसी (Dinner Diplomacy) INDIA ब्लॉक के भविष्य के लिए एक लिटमस टेस्ट की तरह है।
- कौन-कौन होगा शामिल? सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने डिनर में शामिल होने की मंजूरी दे दी है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी दिल्ली पहुंच चुके हैं। हालांकि, राहुल गांधी के कट्टर समर्थक, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, अपनी तबीयत ठीक न होने के कारण शायद शामिल न हो पाएं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पितृशोक में हैं, लेकिन उनकी पार्टी JMM की भागीदारी तय मानी जा रही है। वहीं, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले, जो संसद में विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रही हैं, उनका भी शामिल होना लगभग तय है।
AAP का ‘शर्तों वाला साथ’: दोस्ती या सिर्फ मजबूरी?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल आम आदमी पार्टी के रुख को लेकर है। AAP की रणनीति अब भी रहस्य के बादलों से घिरी है।
- चुनिंदा भागीदारी: SIR के मुद्दे पर AAP इंडिया ब्लॉक के साथ तो है, लेकिन चुनिंदा मौकों पर। उदाहरण के लिए, AAP ने संसद के भीतर इस मुद्दे पर सरकार को घेरा, लेकिन संसद परिसर में हुए INDIA ब्लॉक के संयुक्त विरोध प्रदर्शन से दूरी बनाए रखी।
- प्रेस कांफ्रेंस में दिखी झलक: AAP के संगठन महासचिव संदीप पाठक विपक्ष की उस संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में जरूर शामिल हुए, जिसमें मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल, जावेद अली खान (सपा), और मनोज के झा (आरजेडी) जैसे नेता मौजूद थे। पाठक ने विपक्ष के स्टैंड का समर्थन भी किया।
- क्या AAP की वापसी हो रही है? इस सवाल पर राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “हमने कई बार साफ किया है कि आम आदमी पार्टी इंडिया ब्लॉक में शामिल नहीं है, और हमारी स्थिति अब भी वही है… हमने केवल SIR के मुद्दे पर विपक्ष का समर्थन किया है, क्योंकि ये भारत में लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश है।”
संजय सिंह कहते हैं, “SIR एक गंभीर मुद्दा है… बिहार में 65 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं… विपक्ष को इस पर चर्चा की मांग करने के अपने कर्तव्य से पीछे क्यों हटना चाहिए?”
SIR के आगे क्या है INDIA ब्लॉक का भविष्य?
यह एक कड़वा सच है कि इंडिया ब्लॉक में बिखराव की एक बड़ी वजह कांग्रेस और उसका नेतृत्व ही रहा है। इसलिए, SIR जैसे मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल, शरद पवार और ममता बनर्जी की पार्टियों का एक साथ आना कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन असली सवाल यह है कि इस मुहिम के थमने के बाद इंडिया ब्लॉक का भविष्य क्या होगा?
- राज्य स्तर पर टकराव: इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी कमजोरी राज्यों में आपसी टकराव है। ममता बनर्जी की नरम पड़ती राजनीति के पीछे पश्चिम बंगाल चुनाव हैं, तो आम आदमी पार्टी के गर्म तेवर के पीछे पंजाब विधानसभा चुनाव। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी है।
- समझौते की राजनीति: कांग्रेस ने भी ममता बनर्जी की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया है। कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने ‘बांग्लादेशी भाषा’ के मुद्दे पर ममता के स्टैंड का समर्थन किया है, जो दोनों दलों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की एक कोशिश हो सकती है।
- AAP का भविष्य का रुख: भविष्य में AAP के साथ आने पर संजय सिंह कहते हैं, “वक्त आने पर ही पता चलेगा… अगर भविष्य में भी राष्ट्रीय महत्व के ऐसे ही मुद्दे सामने आते हैं, तो हम उस वक्त स्थिति को देखते हुए विपक्ष को समर्थन देने पर फैसला करेंगे।”
मतलब साफ है, इंडिया ब्लॉक की दुनिया अब लंबी दोस्ती के वादों पर नहीं, बल्कि मुद्दे-आधारित समर्थन (issue-based support) की उम्मीदों पर कायम है। राहुल का डिनर भले ही विपक्ष को एक मेज पर ले आए, लेकिन 2029 की राह में दिल मिलेंगे या नहीं, यह अभी भी एक बड़ा सवाल है।







